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Wednesday, September 27, 2017

शेयर क्या है | What Is Share


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शेयर का अर्थ किसी कम्पनी में भाग या हिस्सा होता है। एक कंपनी के कुल स्वामित्व को लाखों करोड़ों टुकड़ों में बाँट दिया जाता है। स्वामित्व का हर एक टुकड़ा एक शेयर होता है। जिसके पास ऐसे जितने ज्यादा टुकड़े, यानी जितने ज्यादा शेयर होंगे, कंपनी में उसकी हिस्सेदारी उतनी ही ज्यादा होगी। लोग इस हिस्सेदारी को खरीद-बेच भी सकते हैं। इसके लिए बाकायदा शेयर बाजार (स्टॉक एक्सचेंज) बने हुए हैं। भारत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बी॰एस॰ई॰) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एन॰एस॰ई॰) सबसे प्रमुख शेयर बाजार हैं। बी॰एस॰ई॰ की वेबसाइट www.bseindia.com और एन॰एस॰ई॰ की वेबसाइट www.nseindia.com है। हिंदी में शेयर बाजार की जानकारी पाने के लिए शेयर मंथन तथा Share Bazar जैसी वेबसाइटें उपयोगी हैं।
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शेयर कितने प्रकार के होतरे है। 

आमतौर पर  शेयर दो प्रकार के होते हैं: साधारण और वरीय शेयर।

साधारण शेयर्स Ordinary shares

साधारण शेयर (Ordinary shares) किसी भी इंडस्ट्रियल अंडरटेकिंग  में निवेशक की पार्शियल  हिस्सेदारी की  नुमाइंदगी करते हैं। आम शेयरधारक ने जिस कंपनी में निवेश किया है उसके लाभ से डिविडेंड पाता है। यदि वो कंपनी किसी वजह से बंद हो रही है तो पहले सारे हिस्सेदार जैसे कि सरकार, कर्मचारी, कर्जदाता, प्रिफरेंशियल शेयरधारक को भुगतान किया जाता है। इसके बाद यदि रकम बचती है तो आम शेयरधारक को भुगतान किया जाता है। 

वरीय शेयर्स Preferential shares

वरीय शेयर (Preferential shares) के नाम से ही प्रतीत होता है कि अधिमान्य शेयर शेयरधारक कंपनी की प्राथमिकता लिस्ट में आम शेयरधारकों से ऊपर होता है। यानी जब भी डिविडेंड या कंपनी बंद होने की दशा में भुगतान की बात आती है तो प्रिफरेंस शेयरधारकों को प्राथमिकता दी जाती है।

पार वैल्यु Noational value

पार वैल्यू किसी शेयर का अनुमानित मान (Noational value) होता है, यानी कि वो कीमत जो उसे जारी करने वाली कंपनी की बैलेंस शीट में दर्ज होती है। आमतौर पर कंपनियाँ 10  या 100  रुपये की पार वैल्यू रखती है। लेकिन कंपनियाँ कोई भी पार वैल्यू तय कर सकती हैं लेकिन वह 10  के गुणक या अंश में होनी चाहिए जैसे कि 13.5। कंपनी इनीशियल इश्यू के बाद पार वैल्यू में बदलाव कर सकती है।  कोई कंपनी पार वैल्यू से अधिक मूल्य के शेयर जारी कर सकती है, जिसे प्रीमियम कहा जाता है, यदि वह सेबी के लाभप्रदता मानदंड (Profitability Criteria) या लाभ देन सकने के पैमाने पर खरी उतरती है। इसका मतलब  ये हुआ कि कोई कंपनी जरूरी रकम रेजिंग  के लिए कम शेयर जारी कर पाएगी और साथ ही उसकी Dividend liability या लाभांश की देनदारी भी उसी के हिसाब से कम हो जाएगी। उदाहरण के लिये किसी कंपनी के शेयर्स की पार वैल्यू 50  रुपये हैं लेकिन कंपनी सेबी के प्रॉफिटैबिलिटी क्राइटेरिया पर खरी उतरती है इसलिए वो अपने शेयरों को 75रुपये की कीमत पर जारी कर सकती है। यानी 25  रुपये के प्रीमियम पर जारी कर सकती है। यहाँ ये ध्यान योग्य है कि कंपनी अपना लाभांश या डिविडेंड शेयर के पार या फेस वैल्यू पर घोषित करती है, चाहे वो शेयर कितने भी प्रीमियम पर जारी क्यों ना हुआ हो।

शेयर का मूल्य Share price

इनीशियल पब्लिक ऑफर के मामले में कंपनियाँ निम्न तीन तरीकों में से किसी एक तरीके का प्रयोग करते हुए शेयर का मूल्य तय करती हैं:

तय कीमत विधि Fixed price method

यानि फिक्स्ड प्राइस मेथड के अनुसार जिस मूल्य पर शेयर ऑफर किए जाते हैं उसे कंपनी तय कर देती है। ये काम इश्यू खुलने से पहले ही कर लिया जाता है। शेयरों की मांग कितनी है इसका पता कंपनी को तभी हो पाता है जब इश्यू बंद हो जाता है। इस विधि से शेयर्स प्रीमियम पर भी सूचित किए जा सकते हैं।

बुक बिल्डिंग विधि Book Building Method

इस विधि में निवेशक को ऑफर किए शेयर का शुद्ध मूल्य का अनुमान नहीं हो पाता है। इसकी बजाय कंपनी शेयर के लिए सांकेतिक मूल्य रेंज तय करती है। निवेशक अपनी क्षमता के अनुसार अलग-अलग शेयरों के लिए बोली लगाते हैं। ये बोली तय मूल्य परास के भीतर की कुछ भी हो सकती है। शेयरों के लिए आई बोली की मात्रा को देखते हुए शेयर की कीमत तय की जाती है और जितने भी निवेशकों ने इसके लिए आवेदन किया होता है उन्हें इसी कीमत पर शेयर दिए जाते हैं, चाहे उन्होंने बोली में कोई और रकम तय की हो। आर्थिक क्षेत्र में प्रचलित है कि बुक बिल्डिंग विधि के जरिए शेयर की बेहतर कीमत मिल पाती है। Oversubscription होने पर कंपनी ग्रीनहाउस ऑप्शन पर भी जा सकती है।

ग्रीनहाउस- ग्रीनसु विकल्प Green House- Green Shoe Option

प्रायः अधिकांश दातर अच्छी कंपनियों के IPO तय सीमा से कई गुना अधिक बिकते हैं यानी ओवरसब्सक्राइब हो जाते हैं। ऐसे में कंपनी ग्रीनहाउस विकल्प का प्रयोग भी कर सकती है।[1] इसके द्वारा कंपनी अतिरिक्त शेयर जारी कर सकती है ताकि वो निवेशकों की मांग को पूरा पाये। हालाँकि ओवरसब्सक्रिप्शन के अनुपात के बारे में कंपनी को अपने ऑफर डॉक्यूमेंट में पहले से ही बताना आवश्यक होता है।

इस प्रकार इन तीनों तरीकों से आवंटित हुए शेयर निवेशक, संस्थान या कंपनी के डीमैट अकाउंट में जमा हो जाते हैं।

शेयर, अंश या हिस्सा Share

व्यक्ति की चलसंपत्ति दो प्रकार की होती है - भोगाधीन वस्तु (Chose in possession) और वादप्राप्य स्ववस्तु (Chose in action)। भोगाधीन वस्तु के मायने हैं वह संपत्ति जो आपके वास्तविक व्यक्तिगत अधिकार में है लेकिन Provocative self  के मायने वह संपत्ति है जो आपके तात्कालिक अधिकार में नहीं है। उसपर आपका अधिकार है जिसे वैधानिक कार्रवाई द्वारा Executed किया जा सकता है। यह अधिकार सामान्यतः एक Document द्वारा प्रमाणित होता है, उदाहरणार्थ - रेलवे की रसीद द्वारा। Division (कंपनी या समवाय) में एक अंश (हिस्सा या शेयर) भी Provocative self  है और Receipt उसका प्रमाण है। लेकिन भारतवर्ष में Portion goods  माना जाता है। प्रमंडल (Division) अधिनियम (Company act) 1956 की धारा 82 की परिभाषा में कहा गया है कि Division में किसी व्यक्ति का Share या अन्य Vested interests 'चल संपत्ति' माना जाएगा। वस्तुविक्रय अधिनियम (Sale of Goods Act) में वस्तु या माल की परिभाषा में हर प्रकार की चल संपत्ति सम्मिलित है। इसलिए प्रमंडल के अंश केवल Provocative self ही नहीं, अपितु वस्तु या माल (गुड्स) भी हैं।

Share का वास्तविक स्वरूप सरलता से स्पष्ट नहीं किया जा सकता, क्योंकि Division  उसका निर्माण करने वाले Shareholders के समूह से सर्वथा भिन्न है। संस्थापित प्रमंडल (Incorporated Company) की अंशपूँजी (Capital stock) का होना Universal है, यद्यपि अनिवार्य नहीं। यह भी समान रूप से Universal  है, अनिवार्य नहीं, कि पूँजी को अभिहितमूल्य (nominal value) के अंशों में बाँटा जाए। वह व्यक्ति जिसके पास इस प्रकार का अंश है, अंशधारी (Shareholder) कहलाता है। इसलिए प्रत्येक अंशधारी के पास प्रमंडल की पूँजी का एक भाग रहता है। लेकिन विधिक दृष्टि से अंशधारी उस उद्यम या कारखाने का Part owner नहीं है। Enterprise shareholders की संपूर्ण पूँजी से कुछ भिन्न वस्तु हैं। Division की समस्त परिसंपत्ति (Assets) उक्त सुसंगठित संस्थान में निहित है, उसे बनाने वाले व्यक्तियों में नहीं।

विधान की दृष्टि में Shareholders के कुछ अधिकारों और Vested interests के साथ साथ कुछ दायित्व भी हैं। Shareholder का हित या interest महज चल संपत्ति से नहीं, वरन्‌ Own division से होता है। यह interest स्थायी ढंग का होता है। Fraction division में Shareholder का वह हित है जो दो दृष्टियों से धन की रकम के रूप में मापा जाता है, एक तो दायित्व और लाभांश की दृष्टि से, दूसरे ब्याज की दृष्टि से। और इसमें प्रमंडल की 
अंतर्नियमावली (Article of Association) में निहित Contracts भी सम्मिलित हैं। अंश मुद्रा या धन (money) नहीं, अपितु मुद्र के रूप में आँका गया वह हित है जिसमें विभिन्न अधिकार और दायित्व जुड़े हुए हैं। अंश अधिकारों या हकों का विद्यमान समूह है। उदाहरणार्थ, share के कारण Shareholding division के लाभों का एक समानुपातिक भाग प्राप्त करने, Underwrites के आधार पर Division के कारोबार में हाथ बँटाने, कारोबार की समाप्ति पर संपत्ति का आनुपातिक भाग पाने तथा सदस्यता के सभी अन्य लाभों का अधिकारी हो जाता है। share के कुछ दायित्व भी हैं। उदाहरणार्थ - Division की परिसमाप्ति पर पूर्ण मूल्य की देयता। यह सभी अधिकार और दायित्व प्रमंडल के Underwrites द्वारा नियमित अधिकार और दायित्व शेयर या अंश का मूलभूत तत्व है।

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